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रेसिपी

मोहनथाल रेसिपी: दिवाली वाली दानेदार राजस्थानी बेसन बर्फ़ी

म्हारा की रसोई से, शेखावाटी · 8 मिनट ·
पीतल की थाली में बादाम-पिस्ता लगे दानेदार मोहनथाल के टुकड़े, पास में भैंस के घी का जार

यह मोहनथाल रेसिपी दानेदार राजस्थानी बेसन बर्फ़ी की है: मोटे बेसन में घी और दूध का धाबा लगाकर, उसे घी में धीमी आँच पर सुनहरा और सोंधा होने तक भूनकर, फिर इलायची-केसर वाली एक तार की चाशनी मिलाकर थाली में जमाया जाता है। जमने पर चौकोर टुकड़े काट लें।

हमारी रसोई में दिवाली की पहली मिठाई बाज़ार से नहीं आती, कड़ाही में भुनती है। त्योहार से हफ़्ता भर पहले भारी कड़ाही चूल्हे पर चढ़ती है, घी का जार खुलता है, और अगले आधे घंटे तक जो कलछी चला रहा हो, उससे कोई बात नहीं करता। शाम तक ताक पर मोहनथाल की थाली ठंडी हो रही होती है और पूरी गली में उसकी ख़ुशबू फैल जाती है। यह मोहनथाल रेसिपी वही है: मोटे बेसन में घी और दूध का धाबा, घी में धीमी भुनाई, एक तार की चाशनी और फिर चौकोर टुकड़े।

मोहनथाल देखने में सीधी मिठाई है, पर दो जगह ध्यान माँगती है, भुनाई और चाशनी। इसलिए यह लेख ज़्यादातर इन्हीं दो बातों पर है। सही मात्रा नीचे रेसिपी कार्ड में है।

राजस्थानी मोहनथाल आम बेसन बर्फ़ी से अलग कैसे है?

सादी बेसन बर्फ़ी बारीक बेसन को घी में भूनकर चीनी से जमाई जाती है। राजस्थानी मोहनथाल में तीन बातें ज़्यादा हैं। बेसन मोटा होता है, इसलिए मिठाई में चिकनी बर्फ़ी की जगह रेत जैसा, मुँह में घुलने वाला दाना आता है। भूनने से पहले बेसन का धाबा लगता है, यानी गरम घी और दूध बेसन में मसलकर कुछ देर रखा जाता है। और कई घरों में थोड़ा मावा डाला जाता है, जिससे बीच का हिस्सा नरम और दूधिया रहता है।

जो बनावट चाहिए उसे दानेदार कहते हैं: टुकड़ा तोड़ें तो छोटे-छोटे दाने दिखें, जिन्हें घी और चाशनी ने बाँध रखा हो। दाँत लगते ही दबे और फिर घुल जाए। अगर कड़क से टूटे या पाउडर बनकर बिखरे, तो कहीं गड़बड़ हुई है, और वह क्या है, नीचे बताया है।

धाबा: वह क़दम जो ज़्यादातर रेसिपी छोड़ देती हैं

मोहनथाल का दाना धाबे से ही आता है। 2 बड़े चम्मच घी और 2 बड़े चम्मच दूध साथ में गरम करें, बस घी पिघलने तक। इसे 2 कप मोटे बेसन पर डालें और उँगलियों से दो-तीन मिनट वैसे ही मसलें जैसे आटे में मोयन मसलते हैं। बेसन गीली रेत जैसा नम और गुठलीदार हो जाएगा।

ढककर 20 से 30 मिनट रख दें। फिर मोटी छलनी से, या पूरी वाले झारे के बड़े छेदों से, हथेली से दबाकर छान लें। नीचे एक जैसा बारीक दाना गिरेगा। दूध से हर दाना थोड़ा फूलता है और घी दानों को अलग रखता है, इसलिए भूनने पर ये लेप नहीं बनते, छोटे-छोटे मोती जैसे दाने बनते हैं।

मोटा बेसन न मिले तो चक्की पर मोटा बेसन पिसवा लें, या 1¾ कप साधारण बेसन में ¼ कप बारीक सूजी मिला लें। बिल्कुल वैसा तो नहीं, पर काफ़ी पास बनता है।

घी में बेसन भूनना: धीमी आँच, कोई जल्दी नहीं

भारी कड़ाही में लगभग ¾ कप घी धीमी आँच पर गरम करें। छना हुआ बेसन डालें और चलाना शुरू करें। तले और किनारों से खुरचते हुए 20 से 25 मिनट लगातार चलाते रहें। समय बचाने के लिए आँच तेज़ न करें। बेसन बाहर से अंदर की ओर भुनता है। तेज़ आँच पर ख़ुशबू पहले आ जाती है जबकि दाना अंदर से कच्चा रहता है, और बनी हुई मिठाई में कच्चापन और हल्की कड़वाहट रह जाती है।

बेसन भुन गया है, यह कैसे पहचानें:

  • रंग हल्के पीले से गहरा सुनहरा हो जाए, अच्छे बिस्कुट के अंदर जैसा।
  • मिश्रण हल्का और ढीला हो जाए, और घी उसके चारों ओर बुलबुले और झाग छोड़ने लगे।
  • कच्चे बेसन की गंध जाकर भुनी मूँगफली जैसी सोंधी ख़ुशबू आने लगे।

मावा डाल रहे हैं तो अब ½ कप मावा मसलकर डालें और 3 से 4 मिनट और चलाएँ, जब तक मिल न जाए। फिर कड़ाही आँच से उतार लें। कुछ घरों में इस समय एक बड़ा चम्मच दूध छिड़कते हैं। वह छनछनाकर झाग देता है और मोहनथाल थोड़ा जालीदार बनता है। यह ज़रूरी नहीं है।

मोहनथाल का पूरा स्वाद घी से आता है, इसलिए घी सोचकर चुनें। हम इसमें भैंस का घी लगाते हैं। यह गाढ़ा और मलाईदार होता है, मिठाई को भारी, घुलने वाला स्वाद देता है, और इसका हल्का स्वाद भुने बेसन को आगे रखता है। गाय का बिलोना घी भी अच्छा चलता है, उससे ख़ुशबू तेज़ और रंग ज़्यादा सुनहरा आता है। पूरी तुलना हमारे लेख गाय या भैंस का घी में है।

हमारी रसोई की बातजब बेसन लगभग दो-तिहाई भुन जाए, तभी चाशनी चढ़ा दें, ताकि दोनों साथ तैयार हों। जो चाशनी बेसन का इंतज़ार करती रहती है, वह अपनी ही गरमी से पकती रहती है और चुपचाप एक तार से आगे निकल जाती है।
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एक तार की चाशनी

एक पैन में 1 कप चीनी, ½ कप पानी और केसर के कुछ धागे डालें। चीनी घुलने तक चलाएँ, फिर मध्यम आँच पर बिना चलाए उबलने दें। 5 से 7 मिनट उबलने के बाद जाँचना शुरू करें। चम्मच पर एक बूँद लें, कुछ सेकंड ठंडी होने दें, अँगूठे और उँगली के बीच लेकर खोलें। एक पतला तार बने जो जल्दी टूट जाए, यही एक तार है। वहीं रुक जाएँ और ½ छोटा चम्मच इलायची पाउडर डाल दें।

पूरी मिठाई इसी पर टिकी है। दो तार हुई तो मोहनथाल ईंट जैसा जमेगा। आधा तार रहा तो कई दिन तक नरम और चिपचिपा रहेगा। पहली बार बना रहे हों तो जल्दी से जाँचना शुरू करें और बार-बार जाँचें। आख़िर में चाशनी सोच से ज़्यादा तेज़ी से बदलती है।

मोहनथाल रेसिपी: मिलाना, जमाना और काटना

भुना बेसन आँच से हटाकर 3 से 4 मिनट ठंडा होने दें। बहुत गरम रहे, बस तलने जैसा न हो। अब चलाते-चलाते धीरे-धीरे चाशनी डालें। मिश्रण छनछनाएगा, फिर ढीला और चमकदार, लगभग गाढ़े घोल जैसा दिखेगा। घबराएँ नहीं। आँच से बाहर ही 3 से 5 मिनट चलाते रहें। ठंडा होते-होते यह गाढ़ा होता है, और जब कड़ाही के किनारे छोड़ने लगे और हल्का दानेदार दिखे, तब तैयार है।

8 इंच की थाली में घी लगा लें। मिश्रण डालें, थाली को स्लैब पर हल्का थपथपाएँ ताकि बराबर बैठ जाए, और घी लगी कटोरी के पीछे से ऊपर से चिकना कर दें। बादाम और पिस्ता की कतरन डालकर हल्के से दबा दें। चाँदी का वर्क चाहें तो लगाएँ, घर में हम अक्सर नहीं लगाते।

कमरे के तापमान पर 2 से 3 घंटे रखें। लगभग 30 मिनट बाद, जब अभी नरम हो, चाकू से टुकड़ों के निशान लगा दें, और जमने पर पूरा काट लें। जल्दी काटेंगे तो टुकड़ों के किनारे नहीं बनेंगे। पूरा ठंडा और सख़्त होने तक रुकेंगे तो ऊपर से चटक जाएगा।

मोहनथाल सख़्त क्यों बना, या जमा क्यों नहीं?

मोहनथाल रेसिपी में कुछ बिगड़े तो लगभग हमेशा वजह चाशनी या आँच होती है। अक्सर यह होता है:

  • पत्थर जैसा सख़्त: चाशनी एक तार से आगे निकल गई। अगली बार पहले रुकें। इस बार वाले को मसलकर थोड़ा गरम दूध डालें और धीमी आँच पर नरम हलवा बना लें। कोई शिकायत नहीं करेगा।
  • 3 घंटे बाद भी नहीं जमा: चाशनी कच्ची रह गई। मिश्रण वापस कड़ाही में डालें, धीमी आँच पर 3 से 5 मिनट चलाएँ जब तक किनारे न छोड़े, फिर दोबारा जमाएँ।
  • कच्चा या कड़वा स्वाद: बेसन तेज़ आँच पर भुना, या पूरा नहीं भुना।
  • ऊपर घी तैर रहा है: बेसन के हिसाब से घी ज़्यादा हो गया। साफ़ कपड़े से हल्का सोख लें, स्वाद फिर भी अच्छा रहेगा।
  • दाना नहीं, बर्फ़ी जैसा चिकना: बारीक बेसन और धाबा नहीं लगाया।

मोहनथाल कितने दिन चलता है?

बिना मावे वाला मोहनथाल स्टील या काँच के बंद डिब्बे में कमरे के तापमान पर लगभग एक हफ़्ता चलता है, सर्दी में 10 दिन तक। मावा डाला हो तो 3-4 दिन में खा लें या फ़्रिज में रखें। इसे चूल्हे और धूप से दूर रखें, और परतों के बीच बटर पेपर रखें ताकि टुकड़े चिपकें नहीं। फ़्रिज में यह सख़्त हो जाता है, इसलिए परोसने से आधा घंटा पहले बाहर निकाल लें।

बिना मावे के यह कई दिन चलता है, इसलिए इसे दिवाली से कुछ दिन पहले बनाया जा सकता है। इस साल दिवाली रविवार, 8 नवंबर को है। पूरी मिठाई की थाली सोच रहे हैं तो हमारी देसी घी की दिवाली मिठाइयाँ वाली सूची देखें, और बेसन के लड्डू में भी यही धीमी भुनाई है, बस चाशनी नहीं लगती। पूरी राजस्थानी थाली के लिए साथ में चूरमा बहुत जँचता है।

मोहनथाल भारी मिठाई है। खाने के बाद एक छोटा टुकड़ा, यही इसका सही तरीक़ा है, और सच कहें तो स्वाद भी तभी सबसे अच्छा लगता है।

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रेसिपी कार्ड

35 मिनटतैयारी40 मिनटपकाना10लोगों के लिए

सामग्री

  • 2 कप (240 ग्राम) मोटा बेसन
  • धाबे के लिए 2 बड़े चम्मच घी और 2 बड़े चम्मच दूध
  • भूनने के लिए पौना कप (लगभग 150 ग्राम) भैंस का घी या गाय का बिलोना घी
  • आधा कप (100 ग्राम) मावा या खोया, मसला हुआ (वैकल्पिक)
  • 1 कप (200 ग्राम) चीनी
  • आधा कप (120 मि.ली.) पानी
  • 10–12 केसर के धागे
  • आधा छोटा चम्मच हरी इलायची पाउडर
  • 2 बड़े चम्मच बादाम की कतरन
  • 2 बड़े चम्मच पिस्ता की कतरन
  • थाली में लगाने के लिए 1 छोटा चम्मच घी
  • चाँदी का वर्क (वैकल्पिक)

विधि

  1. 2 बड़े चम्मच घी और 2 बड़े चम्मच दूध घी पिघलने तक गरम करें। बेसन पर डालकर उँगलियों से 2–3 मिनट मसलें।
  2. ढककर 20–30 मिनट रखें, फिर मोटी छलनी से दबाकर एक जैसा दाना छान लें।
  3. 8 इंच की थाली में घी लगाकर तैयार रखें।
  4. भारी कड़ाही में पौना कप घी धीमी आँच पर गरम करें। बेसन डालकर 20–25 मिनट लगातार चलाएँ, जब तक गहरा सुनहरा, झागदार और सोंधी ख़ुशबू वाला न हो जाए।
  5. बेसन लगभग दो-तिहाई भुन जाए तो चाशनी चढ़ाएँ: चीनी, पानी और केसर घुलने तक चलाएँ, फिर मध्यम आँच पर बिना चलाए उबालें।
  6. मावा डाल रहे हैं तो बेसन में मिलाकर 3–4 मिनट और चलाएँ। कड़ाही आँच से उतार लें।
  7. 5–7 मिनट उबलने के बाद चाशनी जाँचें। एक तार (अँगूठे और उँगली के बीच एक पतला तार) पर रुकें और इलायची डालें।
  8. बेसन को 3–4 मिनट ठंडा होने दें, फिर चलाते हुए धीरे-धीरे चाशनी डालें।
  9. आँच से बाहर 3–5 मिनट चलाते रहें, जब तक मिश्रण गाढ़ा होकर किनारे न छोड़ने लगे।
  10. थाली में डालें, घी लगी कटोरी से बराबर करें और बादाम-पिस्ता दबा दें। चाहें तो वर्क लगाएँ।
  11. 30 मिनट बाद टुकड़ों के निशान लगाएँ और 2–3 घंटे में जमने पर पूरा काट लें।
  12. बंद डिब्बे में कमरे के तापमान पर लगभग एक हफ़्ता रखें (मावा डाला हो तो 3–4 दिन, या फ़्रिज में)।

लोग ये भी पूछते हैं

मेरा मोहनथाल सख़्त क्यों बना?

चाशनी एक तार से आगे पक गई। आधा मिनट ज़्यादा पकने से भी मोहनथाल ईंट जैसा जम सकता है। चाशनी जल्दी जाँचना शुरू करें, एक पतले जल्दी टूटने वाले तार पर रुकें, और बेसन भुनने तक उसे आँच पर न छोड़ें।

मोहनथाल में धाबा क्या होता है?

मोटे बेसन में गरम घी और दूध मसलकर 20 से 30 मिनट रखना और फिर छलनी से छानना धाबा कहलाता है। इससे बेसन का दाना एक जैसा बनता है और मोहनथाल चिकनी बर्फ़ी की जगह दानेदार बनता है।

क्या मावे के बिना मोहनथाल बन सकता है?

हाँ। मावे से बीच का हिस्सा नरम और दूधिया बनता है, पर गाँव के कई घरों में मोहनथाल बिना मावे के ही बनता है। बेसन दो-एक मिनट ज़्यादा भूनें, और नरम जालीदार बनावट चाहिए तो भुनाई के आख़िर में एक चम्मच दूध छिड़क दें।

मोहनथाल के लिए कौन सा घी अच्छा है?

राजस्थान के कई घरों में मोहनथाल भैंस के घी से बनता है, क्योंकि वह गाढ़ा और मलाईदार होता है और मिठाई को घुलने वाला भारी स्वाद देता है। गाय का बिलोना घी भी अच्छा है, उससे ख़ुशबू तेज़ और रंग सुनहरा आता है।

मोहनथाल और बेसन बर्फ़ी में क्या फ़र्क़ है?

बेसन बर्फ़ी बारीक बेसन से बनती है और चिकनी जमती है। मोहनथाल मोटे बेसन से बनता है जिसमें धाबा लगता है, अक्सर मावा भी पड़ता है, और यह दानेदार, घुलने वाला जमता है। दोनों घी में धीमी आँच पर भुनते हैं और चाशनी से जमते हैं।

मोहनथाल कितने दिन ताज़ा रहता है?

बिना मावे के, स्टील या काँच के बंद डिब्बे में कमरे के तापमान पर लगभग एक हफ़्ता, सर्दी में 10 दिन तक। मावा डाला हो तो 3-4 दिन में खा लें या फ़्रिज में रखें। परतों के बीच बटर पेपर रखें। फ़्रिज में यह सख़्त हो जाता है, इसलिए परोसने से पहले बाहर निकाल लें।

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